उदघोषक / Announcer

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Monday, March 21, 2011

फिर क्यूँ न हम युद्ध छेड़ते हैं ?

है जीवन जिसका बदल चूका
है किस्मत जिसका चमक उठा
आसमानों से तारे तोड़ चूका
चंदा को लाने की तैयारी
सूरज को घर में रखने की इच्छा
सृष्टी पर राज करने की चेष्ठा
क्या उसी के घर में आज उजाला
है सृष्टी पूरी अँधेरे में डूबी
फिर वो उजाला फैलाते हैं
उसी तारों को बातकर सूरज को रौशनी देते हैं
उसी तारों के बदले
सागर की मांग वे करते हैं
है विश्व पूरा प्यासा कौवा
अब वे नदियाँ वहां बहते हैं
फिर धाक अपनी जमाते हैं
लोग उन्हें पालनहार बुलाते हैं
वो बन ठनकर आते हैं
फिर नदियों पे सौदा करते हैं
ईंधन की बात वे करते हैं
हवा भी उदा ले जाते हैं
फिर क्यों हम उन्हें पालनहार बुलाते हैं ?
अनाज हमारा छिनकर वो
रोटी हमे खिलाते हैं
रोटी के बदले हमपर वो
तानाशाही दिखाते हैं
फिर क्यों न हम युद्ध छेड़ते हैं ?
सूरज को हम पहुचाते हैं
जहाँ से वो सभी को देख सके
तारों को झिलमिल कराते हैं
जिससे सपने नए बुन सके
चंदा को आसमान में बिठाकर
बच्चों की हंसी लौटते हैं
सागर को पृथ्वी पर बहाकर
श्रृष्टि तृप्त करते हैं
नदियों का ऐसा जल बने
पूरा विश्व जिसमे नहा सके
हमें वापस लाना वाही हंसी
जिससे श्रृष्टि सारी हँस सके
पूरा विश्व जिसे गा सके
ऐसा गीत बनाना है हमें

फिर नहीं मिटाना होगा सूरज के रखने वालों को
वो खुद ही पालनहार से हार के कगार पर पहुच चुके
ऐसे पालनहारों का गुरूर हमें मिटाना है.
फिर क्यूँ न हम युद्ध छेड़ते हैं ?
सूरज और तारों को पुनः वहीँ पहुचाते हैं.

                                                                          - श्रीश चन्द्र सिंह