उदघोषक / Announcer

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Friday, August 10, 2012

अभिलाषा

कण - कण के उत्प्लव में जुटती मेरी अभिलाषा 
तृण के नव बूदों सी चमकती मेरी अभिलाषा 
बूदों को पिरोकर पहनने की मेरी अभिलाषा 
नवरोज नव्नायनों से जुटती मेरी अभिलाषा 

प्रेम अप्रेम को जोड़ने की अभिलाषा 
दोस्त - दुश्मन एक प्रतीक बनें 
सरे बंधन तोड़ नवजीवन का वह खोज बने
नवजागरण, नवस्फूर्ति से जग झूम उठे 

बसंत की कलियों सी नवयुग का फिर संचार हो 
पग - पग पर प्रकृति का संसार हो 
आतंक मिटे कुहासों के ढेर सामान 
भाईचारे की उषाकाल की किरणें बिखरे 

गरीबी पतझड़ सा एक साख बने
कुटिलता की फिर वही शाम हो.

               - श्रीश चन्द्र सिंह 

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