तूफ़ान के पहले की शांति
शांति नहीं यह वह मंजर
मिटकर, शाश्वत हो जाने को तैयार
है बन रही एक पृष्ठभूमि
हो रहा एक खाका तैयार
खुद को दे रहा ललकार
मरकर - मिटकर अमिट हो जाने को तैयार
छू उस बुलंदी को, जहां पहुंचें एकाध
जिस दिन टूटी यह शांति
करेगी एक भयानक मंजर
रौंदेगी तमाम सवालों को
लपेटेगी कई परिणामों को
फिर हर कोई शांत होगा
एक नया तूफ़ान होगा
कटेंगे बेतार तार
होंगे कई नए अवतार
बनेगी एक नई मंजिल
चढ़ेंगे कई बेगार
चलेंगे मील हज़ार
है दूर नहीं वह छड़
शाश्वत बनकर वह आया है
कई नवकोपलों को वह सींचेगा
पवन सा ब्रह्माण्ड में वह छा जाएगा
अब तो यह होकर ही रह पायेगा.
- श्रीश चन्द्र सिंह
