उदघोषक / Announcer

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Friday, July 26, 2013

राजनीति के बदलते स्वरुप पर बैजयंत 'जय' पांडा से एक चर्चा


बैजयंत 'जय' पांडा उन चुनिंदा सांसदों में से हैं जिन्होंने अपने दम पर राजनीति में पहचान बनाई है. जय पांडा ने संसद में रहते हुए आठ निजी बिल पेश किये जिनमें एक बिल राजनीति में अपराधीकरण को रोकने से भी संबंधित था. इसी मामले पर हाल में सर्वोच्च न्यायलय ने अपना ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। इसके साथ ही देश की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता वनाम साम्प्रदायिकता के बहस के बीच हमने अपने मित्र अमित के साथ मिलकर उनसे बात की.  प्रस्तुत है सात्क्षात्कार का संपादित अंश … 

                                फोटो-अमित
अमित:-राजनीति में अपराधीकरण को रोकने से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में दो निर्णय दिए हैं, जिसमें दूसरे निर्णय के अनुसार अगर कोई व्यक्ति जेल में हो तो उसे चुनाव लड़ने से रोक देना चाहिए। आपका इस पर क्या कहना है?
जय पांडा:-देखिये व्यापक रूप से मैं इसका समर्थन करता हूँ कि जो दोषी हैं उनको चुनाव लड़ने ने रोका जाना चाहिए इसके साथ ही इनके लिए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स गठित किये जाएँ जो सांसदों और विधायकों के मामलों की सुनवाई करें इसके साथ जिला परिषदों में बैठने वाले या ग्रामप्रधान जैसे सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों से संबंधित मामलों की सुनवाई करें। ये अदालतें नब्बे दिन या छ महीने में अपना फैसला सुना दें। लेकिन जिस स्थिति की आप बात कर रहे हैं, उसे दो भागों में बांटा जा सकता है-माइनर क्राइम और मेजर क्राइम। अगर कोई रैली में किसी का विरोध कर के गिरफ़्तार कर लिया जाए तब उसे चुनाव लड़ने से रोकना सही नहीं होगा लेकिन अगर कोई हत्या, बलात्कार या डकैती जैसे व्हाइट कॉलर क्राइम में पकड़ा जाता है तो फिर ये सही है। फिर उसे रोका जाना चाहिए।

अमित:-इन दो निर्णयों के बाद न्यायपालिका-विधायिका के बीच शक्ति संतुलन की बहस फिर गर्म हो गई है। आप इसे कितना उचित मानते हैं और क्या ये सही है कि व्यवस्था के अंग भले ही अपना काम ठीक से न करें लेकिन फिर भी न्यायपालिका को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए?
जय पांडा:-संविधान ने सभी अंगो की शक्तियां निर्धारित की हैं, लेकिन हमें मानना पड़ेगा की जहाँ हमारी विधायिका/कार्यपालिका अपना काम सही ढंग नहीं करती हैं तब लोगों की तरफ से मांग की जाती है कि चुनाव सुधार होने चाहिए लेकिन हमारी तरफ कोई काम नहीं किया जाता. जब विधायिका काम नहीं करती तो एक वेक्यूम बन जाता है। मैं यहाँ अपने साथियों से कहना चाहता हूँ कि हमने अपना काम न करके मैदान खली छोड़ दिया है उस पर कोई और खेल रहा है। और फिर न्यायिक सक्रियता को लोगों का समर्थन भी प्राप्त है।

श्रीश:-लोकसभा चुनाव में अब एक साल से कम समय है। मोदी के इमरजेन्स के बाद कम्युनल वर्सेज सेक्युलर की बहस तेज़ हो रही है जबकि देश में व्याप्त मंहगाई, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं। आप इसे कैसे देखते हैं?
जय पांडा:-देखिये देश में कोई एक मुद्दा नहीं है और ये सही नहीं है कि बहस सिर्फ दो पार्टियों के बीच हो रही है। पिछले बीस सालों से क्षेत्रीय पार्टियाँ उभर रही हैं और तीन-चार सालों में जो भी सर्वे या ओपिनियन पोल हुए हैं उसमें इन क्षेत्रीय दलों को बढ़त मिलती हुई दिख रही है। तो कम्युनिस्म एक मुद्दा है इसके साथ और भी मुद्दे हैं जैसे विकास एकदम रुक गया है, रूपए की हालत कमज़ोर हो गयी है जिसका हमें फायदा होना चाहिए लेकिन नीतियों के अभाव में हम लाभ नहीं ले पा रहे हैं। तो मुद्दे तो और भी हैं।

श्रीश:-लेकिन इस बहस में तो क्षेत्रीय पार्टियाँ भी शामिल होती दिख रही है चाहे वो जेडीयू हो, समाजवादी पार्टी हो या बीजू जनता दल.?
जय पांडा:- मैं फिर आपसे कहूँगा कि सिर्फ एक मुद्दा नहीं है कई मुद्दे है वो भी एक मुद्दा हो सकता है। जेडीयू के बारे में मैं कोई कमेंट नहीं करना चाहता। क्षेत्रीय दलों की अपनी प्राथमिकताएं होती हैं। ये मूवमेंट (क्षेत्रीय पार्टियों का उभार) सही दिशा में है। 40-50 साल पहले जब हमारा देश युवा गणतंत्र था तब ये जरूरी था कि देश को एकजुट रखा जाए लेकिन आज कोई अलगाववादी नहीं है और क्षेत्रीय दल भी अपनी भारतीयता पर गर्व करते हैं। हम लोगों का क्षेत्रीय मुद्दों के साथ-साथ राष्ट्रीय मुद्दों पर भी अपना दृष्टिकोण हैं. 
 
श्रीश:-हाल में ममता बनर्जी ने फेडरल फ्रंट की बात चलाई जिसमें आपके नवीन पटनायक, जयललिता, मुलायम सिंह आदि ने सहमति जताई है. आप इसका भविष्य कहाँ तक देखते हैं या ये भी आगे चलकर राजग या संप्रग में मिल जायेगा?
जय पांडा:-इसे आप थर्ड फ्रंट कहें या फेडरल फ्रंट एक बात तो सही है कि 120 करोड़ जनसँख्या वाले हमारे देश में बहुत से लोग, वे बहुमत में हो सकते हैं या किसी बड़े समूह में, इन नेशनल पार्टीज को सपोर्ट नहीं करते हैं. दिल्ली में बैठ कर आप सैंकड़ों मील दूर किसी गाँव के लिए नीतियां नहीं बना सकते, डिक्टेट नहीं कर सकते। तमिलनाडु की प्राथमिकताएं अलग हैं, केरल की अलग और ओडीशा की अलग. 
एक उदहारण मैं आपको और दूंगा जैसे NCTC का मसला है, इसे मीडिया ने बहुत गलत ढंग से पेश किया। केंद्र में बैठे लोग इसे ऊपर से लाना चाह रहे थे जिसका सिर्फ हमने ही विरोध नहीं किया बल्कि इन नेशनल पार्टीज के अपने मुख्यमंत्रियों ने भी किया। इसका कारण था कि बिना किसी बातचीत के ये ऐसा कर रहे थे. प्रस्तावित मॉडल पकिस्तान में हैं, रूस में था. हमें यूएसए और ब्रिटेन का उदहारण लेना चाहिए जहाँ केंद्र और राज्यों के सहयोग से न सिर्फ ऐसे मॉडल काम कर रहें हैं बल्कि आतंकवाद पर भी लगाम लगी हुई है. 

श्रीश:-अगर हम कृषि की बात करें तो अब कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की बात होने लगी है. आने वाले समय में भारत की स्थिति में आप इसे किस लिहाज़ से देखते हैं?
जय पांडा:-इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए, अभी भी हमारे यहाँ 60 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर है और ये सस्टेनेबल नहीं है. किसी भी विकसित देश में ऐसा नहीं होता, वहां 3-4 प्रतिशत लोग ही कृषि में लगे रहते हैं और उसी से पूरे देश को खिला सकते हैं और निर्यात भी कर सकते हैं. कृषि विकास दर बहुत कम है. इस क्षेत्र में सुधारों की जरूरत है जिसमें आप जिस कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की बात कर रहे है वो सिर्फ एक एंगल हो सकता है. सिंचाई सुविधाओं में सुधार हो, बाजारों की उपलब्धता बढ़ाई जाए.  

अमित:-आपके अनुसार कुछ स्थानीय और क्षेत्रीय आवश्यकताओं की जरूरतें पूरी करने लिए फेडरल फ्रंट का आईडिया सही है.  लेकिन अगर हम कुछ घटनाओ पर गौर करें तो ये स्पष्ट हो जाता है कि क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय हितों पर हावी हो जाते हैं. जैसे श्रीलंका के साथ संबंध तमिलनाडु, बांग्लादेश के साथ संबंध पश्चिम बंगाल और अगर उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार रही तो अमेरिका के साथ संबंध उत्तरप्रदेश की इच्छा से निर्धारित होंगे। क्या ये ठीक है?
जय पांडा:-देखिये अभी सिर्फ फेडरल फ्रंट की सम्भावना है. जो कुछ होना है उसमें समय है. लेकिन फिर भी ये प्रश्न महत्वपूर्ण हैं. आपको जो शंकाए हैं वे उचित हो सकती हैं लेकिन मुझे इस बात की इतनी शंका नहीं है. ये सही है कि विदेश नीति पर एक राय होनी जरूरी है लेकिन डोमेस्टिक पालिसी में आप दिल्ली में बैठ कर डिक्टेट नहीं कर सकते। आप रूस या जर्मनी को लीजिये या फिर ब्रिटेन को, वहां शीर्ष नेतृत्व को चुनाव जीतने के बाद भी अपनी नीतियों के बारे में लोगों को कन्विंस करना पड़ता है. मीडिया विपक्ष और लोगों से बात करनी पड़ती है. लेकिन हमारे यहाँ सरकारों का एट्टीट्यूड रहता है कि चुनाव जीत गए हैं अब पांच साल तक जो चाहो करो, ये लोकतंत्र नहीं है, हमें उस व्यक्ति से इच्छा के बारे में पूछना चाहिए जो इससे प्रभावित होते हैं.

अमित:-आप नीति निर्माण में जनता की भागीदारी के पक्ष में हैं लेकिन इसी बात के लिए जब सर्वोच्च न्यायलय नियमगिरि हिल्स के खनन में ग्रामसभाओं की भागीदारी के लिए कहा तब आपकी प्रदेश सरकार सिर्फ बारह ग्राम सभाओं को फैसला करने को देती है जबकि उस क्षेत्र में सौ से ज्यादा ग्राम सभाओं को शामिल करने की मांग है?
जय पांडा:-यहाँ पर इस मुद्दे को मीडिया ने गलत ढंग से रिपोर्ट किया है. हम शक्तियों के विकेंद्रीकरण के पक्ष में हैं लेकिन लोगों को इसमें शामिल किया जाए उसको लेकर कन्फ्यूजन है. भूमि अधिग्रहण में उसी से पूछा जाना चाहिए जिसमें इसकी जमीन जा रही हो. बीस मील दूर के लोगों से क्यों पूछा जाए? कोई एक्टिविस्ट कहता है कि अगर पचास गावों में एक भी विरोध करता है तो जमीन का अधिग्रहण नहीं हो तो. ये तो प्रैक्टिकल नहीं है न, बहुमत का मत लिया जाना चाहिए। भूमि अधिग्रहण कानून में यही है. यू कांट कन्विंस एव्री सिंगल पर्सन, इट्स नॉट प्रैक्टिकल। प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून में भी बहुमत का कांसेप्ट अपनाया गया है. 

अमित:-नियमगिरि में वेदांत द्वारा खनन का मुद्दा बन अधिकार अधिनियम (FRA)-2006 से सम्बंधित है अगर भूमि अधिग्रहण कानून बन भी गया तो वह इस पर तो कोई प्रभाव डालेगा नहीं।
जय पांडा:-हमारे कई कानून एक दूसरे के विरोधाभाषी हैं जैसे FRA और MMDR (मिनरल एंड माइनिंग-डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट। इन कानूनों में से कुछ उद्योगों को बढ़ावा देते हैं तो कुछ पर्यावरण सरक्षण को. इनमें कभी-कभी परस्पर विरोधी बातें निकल कर आती हैं. हमें इनमे बीच का रास्ता निकलना चाहिए। ये  कुछ तक विधायिका करेगी और कुछ न्यायपालिका।
 
श्रीश:-राजनीति में आने से पहले आप कॉर्पोरेट जीवन में थे फिर राज्यसभा से होते हुए आप यहाँ तक पहुंचे। आज भारत का युवा राजनैतिक रूप से सक्रिय हो रहा है वह मीडिया और सोशल मीडिया पर एक्टिव है लेकिन इलेक्टोरल पॉलिटिक्स  में नहीं आ पता. इसके लिए आप क्या सुझाव देंगे?

                                                         फोटो-अमित
जय पांडा:-मैं यहाँ तीन-चार बातें कहूँगा। एक तो सभी लोगों को राजनीति  में नहीं आना चाहिये। अगर ऐसा हो रहा है तो इसका मतलब हमारे देश में और जगह भी रोज़गार के अवसर हैं. ये नहीं होना चाहिए कि सभी लोग राजनीति करने लगें फिर तो यहाँ उदासीनता की स्थिति बन जाएगी। दूसरा, राजनीति में आना एक बात है लेकिन किसी को वोट भी न देना अलग बात, ये स्थिति सही नहीं है. और राजनीति में शामिल होने पर कहना चाहूँगा कि इस क्षेत्र में लेवल प्लेयिंग फील्ड अभी नहीं है. एक साधारण नागरिक के सामने राजनीति में आने के रस्ते में बहुत कठिनाइयाँ हैं अगर उसकी पकड़ नहीं है या कोई परिवार का सदस्य पहले से राजनीति में नहीं है तो लिए बहुत मुश्किल है. ये व्यवस्था हमें बदलनी होगी।

श्रीश:- बहुत-बहुत धन्यवाद आपका जो आपने समय दिया और हमसे बात की.
जय पांडा:- जी धन्यवाद और भविष्य के लिए आप लोगों को शुभकामनाएं।    


बैजयंत 'जय' पांडा ओडीशा के केंद्रपाडा का 2009 से लोकसभा में प्रतिनिधित्व करते हैं,
वर्ष 2000 में राज्यसभा से राष्ट्रीय राजनीति में पदार्पण किया, 2006 में पुनः चुने गए। 
जय पांडा ने मिशीगन टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से स्नातक किया है. 

(अरविंद केजरीवाल से हुई बातचीत को पढने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

Thursday, February 28, 2013

बजट की जमीन पर उगेगी आम चुनावों की फसल


चुनावी बजट पेश करने में महारत हासिल कर चुके चिदंबरम जोकि १९९७ और २००८ में भी चुनाव के ठीक पहले बजट पेश कर चुके हैं । मेघालय, त्रिपुरा और नागालैंड के विधानसभा चुनाव परिणामों के बीच एक लोकलुभावन बजट फिर से पेश किया है । मौजूदा वित्तीय वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद इस दशक के सबसे निचले स्तर ५ प्रतिशत पर गोता लगा रहा है । आर्थिक सर्वे २०१३ में वित्तीय घाटा को कम करने के प्रयास में डीजल और एल पी जी पर सब्सिडी घटाकर अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के रेट पर लाने की सिफारिश की गई है । आर्थिक सर्वे में चालू खाते में घाटे से निपटने के लिए सोने के आयात को नियंत्रित करने की बात कही गई है । मिडिल क्लास को साधने की जुगत में जहां पहली बार घर खरीदने वालों को २५ लाख होम लोन पर एक लाख छूट देने की बात की गई है। वहीँ उद्द्योगपतियों को निवेश में बढ़ावा देने के लिए निवेश अलाउंस दिया जाएगा
इस बार के बजट में वित्त मंत्री ने कांग्रेसी लाइन को ही आगे बढाया है । पहली बार शहरी बैरोमीटर से आगे निकलते हुए २०१४ के आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए कृषि, मनरेगा,   डायरेक्ट फंड ट्रांसफर स्कीम, पर ज्यादा ध्यान दिया है ।पी चिदंबरम ने महिलाओं, युवा और गरीब तबके को भारत के तीन चेहरे बताया. महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा का हवाला देते हुए 1,000 करोड़ रुपए के 'निर्भय फंड', युवा वर्ग में स्किल डेवलपमेंट को बढ़ावा देने के लिए 1,000 करोड़ रुपए और गरीबों को सीधे पैसे देने की 'डायरेक्ट ट्रांसफर स्कीम' को पूरे देश में लागू करने की घोषणा की. सामाजिक विकास की योजनाओं को आगे बढ़ाते हुए उन्होनें २००८ की ही परिपाटी को दुहराया है। जहां उसे उस बजट से चुनावों में खासा फायदा हुआ था उसी की उम्मीद में चिदंबरम ने सोनिया की हर बातों का ध्यान रखा है । 
खाद्य सुरक्षा बिल के लिए 10,000 करोड़ का प्रस्ताव किया गया है । 'डायरेक्ट फंड ट्रांसफर' स्कीम को अगले एक साल में पूरे देश में लागू किया जाएगा.
असंगठित मज़दूरों के लिए पैकेज के तहत मज़दूरों के लिए पेंशन, बीमा और मेडिकल सुविधाएं दी जाएंगी. ये योजनाएं अलग अलग मंत्रालयों की है लेकिन एक साथ एक सोशल सिक्योरिटी पैकेज के तहत लागू किए जाने का प्रस्ताव है.
 महिलाओं के लिए बैंकों की घोषणा हुई तो आखिरकर सोनिया गांधी और सुषमा स्वराज के चेहरे पर मुस्कुराहट साफ़ देखी गई ।वित्त मंत्री ने तमिल कवि तिरुवल्लुवर की कविता पढ़ते हुए अपने गृह क्षेत्र  तमिनाडु के भी वोटरों को रिझाने की कोशिश की ।  किसानो के लिए कर्ज माफ़ी और फ़ूड सिक्यूरिटी बिल जैसे लोकलुभावने योजनाओं को आगे बढ़ने में पूरी प्रतिबद्धता दिखाई । समाजवादी पार्टी सहित कई पार्टियों ने इसका विरोध किया है । कुल मिलाकर कई सांसदों के विरोधों के बीच 2014 के चुनावों की जमीन पूरी तरह तैयार है । 


Saturday, January 12, 2013

बलात्कारियों की मानसिक विकृति


बलात्कारियों की मानसिकता पर एक लम्बी बहस चल रही है । इस बारे में मनोवैज्ञानिकों से बात करने पर पता चलता है कि बलात्कार के अधिकतर मामलों में बलात्कारी की मानसिक विकृति जिम्मेदार होती है । जबकि कुछ अन्य मामलों में उनके व्यक्तित्व दोष को जिम्मेदार बताया जाता है ।
मनोचिकित्सक डॉ अलोक सरीन बताते हैं कि रिश्तों में खराबी की वजह से कई बार मानसिक दबाव में यौन हिंसा को बढ़ावा मिलता है । अधिकतर मामलों में इसकी वजह सेक्स की लत भी होती है । इसकी अन्य मुख्य वजह लिंग असमानता भी है । जहां पर पुरुष अपने शारीरिक प्रभुत्व को दिखाने के लिए बलात्कार और हिंसा जैसे कुकृत्य करने पर उतारू होते हैं ।
अमेरिका में कई व्यवहार पुनर्वास केन्द्रों में यह पाया गया कि यौन अपराधी के उपचार के बाद भी लोग महिलाओं को उत्पीड़ित करते हुए पकड़े गए । लैंगिक असमानता और यौन रियाअत का न होना भी इसकी एक मुख्य वजह है ।
बलात्कारियों पर शोध के बाद अधिकतर मामलों में यह पाया गया की सेक्स से ज्यादा यह दिमाग से जुड़ा है । जहाँ पर हिंसा की भावना और शारीरिक प्रभुत्व दिखाने की विकृत मानसिकता ही जिम्मेदार होती है ।
बलात्कार होने का मूल कारण यह कभी नहीं हो सकता की नारी का पहनावा किस तरीके का था । या फिर वह रात में घर से बहार क्यों निकली । बल्कि यह बलात्कारी के मन में चलती लगातार सोच और उसकी मनोदशा का प्रत्यक्षीकरण  है । जो लोग यह कहते हैं कि किसी खास पहनावे की वजह से कर्ता की कामवासना इस स्तर पर पहुँच जाती है की वह बलात्कार कर बैठता है । यह बिलकुल गलत और आधारहीन है । यदि ऐसा होता तो छोटी बच्चियों या फिर 50 - 55 साल की महिलाओं के साथ ऐसा कुकृत्य घटित न होता ।
यदि कोई फूल बहुत ही सुन्दर और खुशबू युक्त है और कोई उसे तोड़ कर मसल डाले और गलती भी फूल की बताई जाए तो यह कैसे न्यायसंगत हो सकता है । 
अतएव बलात्कार, बलात्कारी के मन में चलती लगातार विकृत मानसिकता का ही प्रतिरूप है ।