उदघोषक / Announcer

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Sunday, August 26, 2012

मिट रही शाख अनशन की

संसद में भी हंगामा मचता रहता है
रोज कहीं न कहीं हड़ताल रहती है 
सड़कों पर भी कुछ लोग सिर फोड़ते दिखते हैं 
जंतर मंतर पर धरना दिए मिलते हैं 
                   जनता भी है पक चुकी
                   आंदोलनों से है कान फटे 
                   है खत्म हो रही श्रद्धा उनकी 
                   है मिट रही शाख अनशन की 

             -- श्रीश चन्द्र सिंह 

Tuesday, August 14, 2012

नवस्फूर्ति

है रुका नहीं , है झुका नही 
बस कुछ सिलवटें पड़ चुकी हैं 
सुंदर हीरे पर कुछ कालिख सी जम गई है 
उस हीरे को हम फिर से चमकाएँगे 
पूरी दुनिया को एक अचूक यन्त्र,
फिर से दिलवाएंगे .
सपनों सी दौड़ती इस जिंदगी में,
वास्तविकता का पुट दिखलायेंगे.

फिर से वही शांति का मंजर होगा,
सर्वजन जिसमें एक अद्भुत शक्ति पायेंगे.
अस्त्र - शस्त्र, परमाणु बम के दिन लद जायेंगे,
स्वाभिमानी, स्वावलंबी जीवन जीना हम सिखलायेंगे.

जाति- पात, ऊँच - नीच फिर से बेमानी होंगी ,
नवरोज नवस्फूर्ति जगनी होंगी.
                               
                         - श्रीश चन्द्र सिंह 

Friday, August 10, 2012

पारिवारिक बंधन

पारिवारिक बंधन , एक ऐसा बंधन जो किसी भी तरीके से तोडना मुश्किल है. जब हम याद करते हैं, अपने परिवार वालों को और उनकी भूली बिसरी यादों को, तो दिल और दिमाग पता नहीं क्यों एक अजीब सी खुशी महसूस करता है. हमारे भाई - बहन, अम्मा, चाचा - चाची, बुआ मौसी, दीदी - ये सारे एक ऐसी जादुई चीज हैं, जो हमे निरंतर आगे बढ़ने को प्रेरित  करती हैं. और हमें आत्मबल प्रदान करती हैं. एक ऐसी भावनात्मक लहर जो हमको समाज में एक गरिमामयी पदवी प्रदान करती है.
      हमारे आत्मविश्वास को बढाने का प्रेरक. उनकी चुलबुली हरकतें, जो हमारे गुस्सैल स्वभाव को उकेरती हैं. एक अलग सा चेहरा सामने आता है. लेकिन कुछ देर बाद सब कुछ सामान्य. कभी - कभी परिवार में कुछ न कुछ ऐसा घटित हो जाता है, जो मन को विचलित कर देता है. मन उखड जाता है. लेकिन एक दिन बाद फिर सब कुछ सामान्य. सोचता हु की यह सब मनुष्य की प्रकृति ही है. फिर मई भी तो इससे अछुता नहीं हूँ . फिर क्यू, इन सब बातों पर गौर करूँ , सब कुछ भुला देता हु. 
      और मस्ती का माहौल, जब हम सब सभी मिलकर गप्प, ठहाके और हंसी करतें हैं तो मन को अजीब सी शांति मिलती है. परिवार में कुछ समय ऐसा भी आता है, जब पूरा माहौल किसी कारण से असामान्य हो जाता है. उस माहौल को भी हम लोग धीरे - धीरे अनुकूल करते हैं. फिर किसी का रूठ जाना, या छोटी - छोटी बातों पर अहम् को लेकर झगडा हो जाना तो आम बात है. लेकिन कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकलता है कि परिवार एक ऐसा माध्यम है, जो हमे जीवन जीने की राह दिखाता है. हर एक भावों और माहौलों में जीना  सिखाता है. कठिनाइयों से लड़ना सिखाता है. जो हमारे जीवन का आधार है, और इसी की वजह से ही हम समाज में अपनी प्रतिष्ठा भी बना सकते हैं.
       कम से कम मैंने तो इन सारी बातों को महसूस किया है. मैं जो जन्म से ही संयुक्त परिवार में रहता आ रहा हूँ , और उसी का पछधर भी हूँ . और मैं समझता हूँ कि ऐसा सभी के लिए जरूरी है. अगर हमारा परिवार हमारे साथ है, तो हममे एक अजीब सा आत्मविश्वास सामने आता है. और जो हमारे दिमाग को शुद्ध करता है.  लेकिन कभी - कभी परिवार में कुछ ऐसे लोगों कि भी उपस्थिति हो जाती है जो परिवार को सही रास्ते पर चलने में असुविधा पैदा करते हैं. हमें ऐसे सदस्यों कि बातों को अनसुना कर देना चाहिए. लेकिन उस सदस्य से कभी ईर्ष्या नहीं रखनी चाहिए. क्यूंकि कुछ लोगों कि प्रवृति ही ऐसी होती है. 
        परिवार भी एक माध्यम है हमारे व्यक्तित्व को निखारने का. मै ईश्वर से गुजारिश करता हूँ की सभी को एक अच्छा परिवार नसीब हो. 

                                                                                                                                                                                                                         - श्रीश चन्द्र सिंह 

अभिलाषा

कण - कण के उत्प्लव में जुटती मेरी अभिलाषा 
तृण के नव बूदों सी चमकती मेरी अभिलाषा 
बूदों को पिरोकर पहनने की मेरी अभिलाषा 
नवरोज नव्नायनों से जुटती मेरी अभिलाषा 

प्रेम अप्रेम को जोड़ने की अभिलाषा 
दोस्त - दुश्मन एक प्रतीक बनें 
सरे बंधन तोड़ नवजीवन का वह खोज बने
नवजागरण, नवस्फूर्ति से जग झूम उठे 

बसंत की कलियों सी नवयुग का फिर संचार हो 
पग - पग पर प्रकृति का संसार हो 
आतंक मिटे कुहासों के ढेर सामान 
भाईचारे की उषाकाल की किरणें बिखरे 

गरीबी पतझड़ सा एक साख बने
कुटिलता की फिर वही शाम हो.

               - श्रीश चन्द्र सिंह 

Thursday, July 26, 2012

अब तो यह होकर ही रह पायेगा

तूफ़ान के पहले की शांति 
शांति नहीं यह वह मंजर 
मिटकर, शाश्वत हो जाने को तैयार 
है बन रही एक पृष्ठभूमि
हो रहा एक खाका तैयार
खुद को दे रहा ललकार 
मरकर - मिटकर अमिट हो जाने को तैयार
छू उस बुलंदी को, जहां पहुंचें एकाध
                      जिस दिन टूटी यह शांति
                      करेगी एक भयानक मंजर
                      रौंदेगी तमाम सवालों को
                      लपेटेगी कई परिणामों को
                      पहुंचेगी कई मुकामों तक
                      फिर हर कोई शांत होगा
                       एक नया तूफ़ान होगा
कटेंगे बेतार तार 
होंगे कई नए अवतार 
बनेगी एक नई मंजिल
चढ़ेंगे कई बेगार 
चलेंगे मील हज़ार
                       है दूर नहीं वह छड़
                       शाश्वत बनकर वह आया है 
                        कई नवकोपलों को वह सींचेगा 
                        पवन सा ब्रह्माण्ड में वह छा जाएगा
                        अब तो यह होकर ही रह पायेगा.


                                    - श्रीश चन्द्र सिंह