है रुका नहीं , है झुका नही
बस कुछ सिलवटें पड़ चुकी हैं
सुंदर हीरे पर कुछ कालिख सी जम गई है
उस हीरे को हम फिर से चमकाएँगे
पूरी दुनिया को एक अचूक यन्त्र,
फिर से दिलवाएंगे .
सपनों सी दौड़ती इस जिंदगी में,
वास्तविकता का पुट दिखलायेंगे.
फिर से वही शांति का मंजर होगा,
सर्वजन जिसमें एक अद्भुत शक्ति पायेंगे.
अस्त्र - शस्त्र, परमाणु बम के दिन लद जायेंगे,
स्वाभिमानी, स्वावलंबी जीवन जीना हम सिखलायेंगे.
जाति- पात, ऊँच - नीच फिर से बेमानी होंगी ,
नवरोज नवस्फूर्ति जगनी होंगी.
- श्रीश चन्द्र सिंह

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